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मुझे प्यार नहीं चाहिए!

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हाँ शायद तुम्हें यह पढ़ कर अजीब लगे, मुझसे एक पल के लिए नफरत हो, या मुझ पर बेशुमार गुस्सा आये, मगर सच में मुझे प्यार नहीं चाहिए| 

मुझे तुम्हारे साथ में, मेरे हैरानी भरे दिन के बाद शाम की कॉफी-सा सुकून चाहिए| तुम्हारी एक ‘हेलो’ में सारी परेशानी के छू मंतर होने का वो जादू ही तो चाहिए| बिना किसी प्रश्न के केवल गहरे मौन में घंटों बैठे रहने के लिए मुझे तुम्हारा हाथ चाहिए| बेशक मुझे तुम्हारे मन में वो कोना चाहिए जहाँ मैं ऊपर वाले कमरे के अँधेरे कोने की तरह घंटों बैठ कर ख़ामोशी में रोती रहूँ| इतनी भी दुःखी नहीं हूँ मैं, मगर छत पर बैठे तारों को तकते रहने में जो सुकून मिलता है और शाम को बादलों में अलग-अलग आकृतियाँ बनाने की जो ख़ुशी है, बस वो चाहिए| तुम्हारे साथ की बेशुमार हँसी का हर पल चाहिए, जहाँ तुम और मैं अपने आज को भुला देते हों| मुझे तुम में अपनी ज़िन्दगी का वो आइना चाहिए जिसमें मैं खुद के वास्तविक रूप को देख सकूँ और शायद वो रीडिंग ग्लास जिसकी मदद से खुद को पढ़ सकूँ| जिस तरह बिना समय की परवाह करे कहानियों के किरदार में गुम हो जाती हूँ, ठीक उसी तरह मुझे तुम्हारे साथ बिना ट्रैक रखने वाला वक़्त चाहिए| 

मुझे ज़ाहिर करने की ज़रूरत पड़ने वाला प्यार नहीं चाहिए| मुझे तप्ती गर्मी में आमरस के सुकून जैसा और बारिश में छाते जैसा बस तुम्हारा साथ चाहिए|

शायद कहने-सुनने में फ़िल्मी लगे, या मेरे ख़यालात काफी पुराने ज़माने के लगें, मगर जो ऐसा नहीं तो मुझे प्यार नहीं चाहिए|

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Aprajeeta Singh

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